प्रेम कहाँ से आया

श्रीकृष्ण के जीवन में श्रीराधा का क्या स्थान है ये वही जानते हैं जो श्रीराधा को जानते हैं, भजते हैं। शास्त्रों में श्रीराधा का नाम लेने के पश्चात ही कृष्ण कहने को कहा गया है। जो ऐसा नहीं करता तो वह पाप का भागीदार बनता है। ऐसा ब्रह्मवैवर्त पुराण के दूसरे भाग के कृष्णजन्म खण्ड के (१२४) अध्याय में कहा गया है।

प्रलये ब्रह्मणः पाते तन्निमेषो हरेरपि।

आदौ राधां समुच्चार्य पश्चात्कृष्णं परात्परम्॥९॥

जब इस सृष्टि का जन्म भी नहीं हुआ था, कोई सूर्य-चन्द्रमा नहीं थे, कोई ब्रह्मा जी नहीं थे, कोई वायु नहीं थी, कहीं जल नहीं था तब भी श्रीराधा श्रीकृष्ण के संग थीं, ऐसा पुराणों में बताया गया है।

जब पृथ्वी पर श्रीकृष्ण ने जन्म लिया तो श्रीराधा ने भी उन्हीं के संग धरती पर वृषभानु जी के यहाँ पर जन्म लिया। वे श्रीकृष्ण के संग वृंदावन में साथ ही लीलाएं करती दिखती हैं, ये भी कई पुराणों में वर्णित है।

प्रश्न है कि जब भगवान श्रीकृष्ण इस धरती पर दुष्ट आत्माओं को समाप्त करने के लिए मथुरा, वृंदावन, द्वारका, इन्द्रप्रस्थ और कुरूक्षेत्र इत्यादि में धूम रहे थे तो श्रीराधा उनसे दूर बैठी श्रीकृष्ण से दूर रहने का दुःख क्यों सहन कर रही थीं? श्रीराधा को श्रीकृष्ण अपने संग क्यों लाये थे? अगर श्रीराधा उनके संग ना आतीं तो उन्हें यह विरहाग्नि में से नहीं गुजरना पड़ता। परन्तु इस सबसे विलोम ही क्यों हुआ? सब कुछ जानने वाले श्रीकृष्ण ने ऐसा क्यों होने दिया?

श्रीकृष्ण का जीवन जहाँ हमें कर्म करते रहने की शिक्षा देता हैं, अत्याचारों का अंत करने के लिए हथियार उठाने का पाठ सिखाता है, वहीं एक दूसरा पहलू बहुत मजबूती से इन सब के पीछे खड़ा दिखाई देता है और वह है प्रेम की शिक्षा। आज अगर ये संसार और सृष्टि टिकी हुई है तो केवल प्रेम ही इसका आधार है। अगर प्रेम नहीं होता तो हर दिशा में केवल अंधेरा और मारकाट ही होती। यही बस केवल यही हम मानव जाति को सिखाने-समझाने के लिए ही श्रीराधा उनके साथ आईं थी। प्रेम के बिना क्या कोई किसी समाज की कोई कल्पना कर सकता है?

हमारे आसपास ही ऐसे बहुत-सारे उदाहरण मिल जाएंगे कि पहले प्रेम हुआ और फिर उन्होंने शादी कर ली, परिवार बढ़ा कर लिया। आज भी वह इस प्रेम की नींव पर खुशी-खुशी अपना जीवन व्यतीत कर रहें हैं। क्योंकि उनके पास राधाकृष्ण के प्रेम का अर्थ है, वह उसे जानते और समझते हैं। परन्तु यही अगर हम किसी ऐसे समाज की ओर देखें जिन्हें श्रीराधाकृष्ण के प्रेम से कोई सरोकार नहीं है तो वहाँ केवल आपको औपचारिकता ही दिखाई देगी। प्रेम नहीं है तो विछोह भी जल्द ही हो जाता है। यही कारण है कि पाश्चात्य सभ्यता ने श्रीराधाकृष्ण के प्रेम के अर्थ का मर्म जाना और वे भी इसे अपनाने लगी है, राधाकृष्ण भजने लगी है।

तव पूजा जगन्मातर्लोकशिक्षाकरी शुभे ।

ब्रह्मस्वरूपा भवती कृष्णवक्षःस्थलस्थिता॥ ३॥

श्रीराधा के श्रीकृष्ण के संग आने का केवल यही एक मात्र अर्थ समझ में आता है। श्रीराधा श्रीकृष्ण के शरीर का ही एक अंग है। वह तो श्रीकृष्ण के वक्षस्थल में सदा स्थित रहती हैं। अगर वे अलग से ना भी आतीं तो श्रीकृष्ण के जीवन की कोई भी घटना शेष नहीं रह जानी थी। अन्तर केवल यही होना था कि हम मानव जाति को प्रेम का अर्थ नहीं मिलना था, ये प्रेम शब्द हमारे बीच में नहीं होना था। और उसके बिना के समाज की कल्पना कोई भी कर सकता है। ये प्रेम शब्द हमें राधाकृष्ण के प्रेम ने दिया है और इस प्रेम शब्द को भारत ने पूरे विश्व को दिया है, इसमें किसी को कोई शक नहीं होना चाहिए। महोपनिषद् के अध्याय ६, मंत्र ७१ में अंकित श्लोक वसुधैव कुटुम्बकम में भी यही प्रेम का संदेश छुपा हुआ है। अगर प्रेम है तो विश्व एक परिवार है। 
(कृष्ण एक सत्यज्ञान पुस्तक के अंश)

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